Sunday, 17 April 2016

'मर्सिया':रश्मि बजाज

*मर्सिया*
(2016 की मनहूस फरवरी-मौत हरियाणा की)

कैसा आलम था
कैसी दहशत थी
आग थी खून था
और वहशत थी
थी नदारद पुलिस
या 'उन 'के संग
फ़ौज पत्थर की
जैसे मूरत थी

शक्ति-नगरी से
कुछेक मीलों पर
ख़ूनी तांडव
कई दिन
चलता रहा
टूटते रहे
चूड़ियाँ कंगन
महल जम्हूरियत का
जलता रहा

'गोल्ड-जुबली' के
जश्नी साल में ही
मेरे हरियाणा की
है मौत हुई...

मेरे ग़म में
शरीक होने को
कोई भी ख़ैरख्वाह
नहीं आये
कोई भी रहनुमा
नहीं पहुंचे
न मसीहों के ही
मिले साये
एक साजिश है
बस ख़ामोशी की
गूंजती है तो
मेरी सिसकी ही

अब है
हर ग़ज़ल
ग़मज़दा बेवा
हरेक नज़्म है
ज्यों मर्सिया...
                        रश्मि बजाज

(अज़ीज़ दोस्तों,ये मर्सिया लंबे वक्त से मेरी कलम पर मेरी माटी का उधार था...इसे चुकाए बिना जीना दुश्वार था!)

Thursday, 14 April 2016

POETIC TRIBUTE TO BHIM RAO AMBEDKAR_'AAG ZINDA RAHI'

आग ज़िंदा रही...

आँधियों ने
बहुत सितम ढाये
बहुत सी साजिशें
अंधेरों ने कीं
फिर भी
रौशन रहा
बेख़ौफ़ चिराग़
उसके
अंदर की आग
ज़िंदा रही!

उसमें जलता था
सुर्ख खूने-जिगर
उसकी लौ
तेज़ और तेज़ हुई
आज मांगे है
उससे नूरो-जमाल
पशेमाँ आसमां!
पशेमाँ ज़मीं!
                        -रश्मि बजाज

(Proud of such great Heritage!Hats off)

Tuesday, 29 December 2015

INDIA:P0EM

ऐ मेरे दोस्त!नया ख्वाब सजाना है हमें!
आ मेरे साथ,नया मुल्क बनाना है हमें!

हमें है आसमां पे लिखनी कहानी अपनी
वतन पे करनी है कुर्बान जवानी अपनी

भूख को, प्यास को, ज़ुल्मों को मिटाना है हमें
इक नया नक्श ,नया नक्शा बनाना है हमें
हर अँधेरे को बहुत दूर भगाना है हमें
दे के खूने_जिगर चराग जलाना है हमें

प्यासी रूहों को जामे_नूर पिलाना है हमें
हक़ औरत को भी इन्सां का दिलाना है हमें
हर एक सोज़ को अब साज़ बनाना है हमें
पाँव की बेड़ी को परवाज़ बनाना है हमें

हर विराने को गुलिस्तान हम बना देंगे
अब तो मरघट में भी इक बाग़ हम खिला देंगे

ईद_दीवाली को इक साथ मनाना है हमें
काबा_काशी को एक जगह बसाना है हमें
दहशतों वहशतों का दौर मिटाना है हमें
कभी बंसी तो कभी चक्र उठाना है हमें

नया मज़हब ,नया इंसान हम बनाएंगे
इक नया शहर,नया गांव हम बसाएंगे
कौम को नींद से खुदगर्ज़ी की जगायेंगे
ज़िन्दगी का नया इक फलसफा सिखाएंगे

अपने अंदर के दरिंदे को हराना है हमें
मीर_ग़ालिब के समन्दर में समाना है हमें
सूर_तुलसी के भक्ति_रस में नहाना है हमें
कबीर_संत के साधो को जगाना है हमें

ऐ मेरे दोस्त!नया ख्वाब सजाना है हमें!
आ मेरे साथ,नया मुल्क बनाना है हमें!

_____रश्मि बजाज

Friday, 18 December 2015