Wednesday, 10 May 2023

"नए विमर्श का प्रतिनिधि आख्यान:अनंत विजय की कृति"मार्क्सवाद का अर्धसत्य": समीक्षक - रश्मि बजाज

 (“मार्क्सवाद का अर्धसत्य”,अनंत विजय, वाणी प्रकाशन, नई देहली,2019,सजिल्द, पृष्ठ संख्या-295,मूल्य-695 रुपये)





 *"नए विमर्श का प्रतिनिधि आख्यान:अनंत विजय की कृति"मार्क्सवाद का अर्धसत्य"

 जीवन एवं जगत के अंतिम सत्य की खोज एक शाश्वत अनवरत यात्रा है एवं मानव की यह खोजयात्रा सदियों से चल रही है।इस यात्रा की शाब्दिक एवं बौद्धिक अभिव्यक्ति साहित्य और दर्शन के रूप में दृष्टिगोचर होती है । प्रत्येक युग की अपनी एक विशिष्ट चेतना हुआ करती है।मानवीय संस्कृति और सभ्यता पुनरपुनः उस मोड़ पर आ खड़े होते हैं जब सामूहिक चेतना में युगांतरकारी परिवर्तन होते हैं तथा यह परिवर्तनकामी सामूहिक चेतना उस दौर के राजनैतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्य ,साहित्य, विमर्श एवं आलोचना में परिलक्षित होती है।आज समकालीन हिंदी साहित्य भी कुछ ऐसे ही युगांतरकारी कालखंड का साक्षी बन रहा है। पिछले कई दशकों से हिंदी साहित्य एवं विमर्श 'मनुस्मृति- दहन 'एवं 'मार्क्स- महिमामंडन' पर 'फिक्सेटिड 'हो कर मानो जड़वत हो चुका था । अब कुछ अलग स्वर सुनाई देने लगे हैं, नए प्रश्न पूछे जा रहे हैं,नए मुद्दे उठाए जा रहे हैं तथा हिंदी का रचनाकार, विमर्शकार,आलोचक स्थापित विमर्श एवं मापदंडों से कुछ अलग कहने का किंचित साहस कर रहा है। हाल ही में प्रकाशित आशीष कौल का काश्मीरी हिन्दू-केंद्रित उपन्यास "रिफ्यूजी कैम्प ",राजीव रंजन प्रसाद का नक्सलवाद समस्या पर लकीर से हट कर लिखा गया उपन्यास "लाल अंधेरा “एवं बौद्धिक विमर्श में अनंत विजय का "मार्क्सवाद का अर्धसत्य"- ये कुछ किताबें इस नए विमर्श की प्रतिनिधि रचनाएं बनकर उभरती हैं।अनंत विजय की यह किताब इस मायने में और अधिक विशिष्ट हो जाती है कि हिंदी विमर्श में मुख्यधारा के विपरीत जाने का साहस अभी बहुत कम विचारक ही दिखा पाए हैं । इस विस्तृत फलक वाली पुस्तक में 'प्रेक्टिसड मार्क्सवाद' अर्थात् मार्क्सवाद के 'बौद्धिक अनुयायियों और भक्तों के क्रियाकलापों' का विस्तृत आकलन व मूल्यांकन किया गया है ।लेखक को मार्क्सवाद से उतनी आपत्ति नहीं जितनी मार्क्सवादियों के आचरण -व्यवहार से है जहां उसे दोगलापन, पाखंड, निकृष्टता,स्वार्थपरता , इस्लाम-समर्थक 'सलेक्टिव सेकुलरिज़्म' ,भ्रष्टाचार ,चुप्पी के षड्यंत्र ,वामपंथी 'फासीवाद' और बौद्धिक अस्पृश्यता का बोलबाला नजर आता है । अनंत विजय ने राजनैतिक ,सामाजिक,बौद्धिक एवं साहित्यिक क्षेत्रों में मार्क्सवादियों द्वारा पूर्ण , समग्र सत्य के स्थान पर केवल ‘अर्धसत्य’ अथवा ‘विकृत सत्य’ को प्रस्तुत कर जनचेतना को भ्रमित करने के खेल का बेबाक पर्दाफाश किया है।लेखक का अफ़सोस यह है कि मार्क्सवाद के वर्चस्व के चलते हिंदी का साहित्यकार मुख्यतया एक राजनीतिक कार्यकर्ता बन कर रह गया है एवं साहित्य एक विचारधाराप्रतिबद्ध दलगत पॉलिटिक्स का अखाड़ा जहां लेखकसंगठन ताल ठोक कर हुंकार भरते हैं:"सिर्फ लिखने से काम नहीं चलेगा।सड़क पर उतरना होगा"!रामचन्द्र शुक्ल के विचार "साहित्य को राजनीति से ऊपर रहना चाहिए " से सहमत यह लेखक समकालीन साहित्यकार को आगाह करते हुए उसे चेतावनी देता है:"कलम को अगर हम किसी खास विचारधारा का गुलाम बनाएंगे या फिर कलम की धार किसी खास समुदाय के समर्थन में उठेगी तो समय के साथ उस कलम पर से पाठकों का विश्वास उठता चला जायेगा।" पुस्तक के नौ अध्याय विविध प्रसंगों ,उदाहरणों एवं उद्धरणों द्वारा मार्क्सवादियों के 'बौद्धिक छलात्कार' एवं 'प्रतिरोध के पाखंड' को पाठकों के समक्ष बेपर्दा करते हैं।अवार्ड वापसी,जे.एन.यू का कन्हैयाकुमार प्रसंग ,कृष्णा सोबती-कायनात काज़ी प्रसंग,सलमान रुश्दी प्रसंग,तसलीमा नसरीन प्रसंग,एम एफ हुसैन प्रसंग पर लेखक अपना असहमतिपूर्ण दृष्टिकोण सामने रखता है।वह घिसे -पिटे मार्क्सवादी रिकॉर्ड :"साहित्य का मतलब प्रतिरोध होता है,वह सत्ता के साथ नहीं होता" को धता बताता है क्यों कि यह एक बड़ा झूठ है जहाँ अपनी सुविधानुसार सत्ता का समर्थन अथवा विरोध किया जाता है । वामपंथ की वैचारिक असहिष्णुता पर यहां गंभीर प्रश्न उठाया गया है:"क्या वामपंथी या किसी अन्य विचारधारा को मानने वालों को अपने से अलग विचारधारा के साथ विचार-विनिमय नहीं करना चाहिए?" अनंत विजय का यह मानना है कि वामपंथी दृष्टिकोण की अनन्य प्रभुता और वर्चस्व के चलते हिंदी साहित्य एवं विमर्श की अपूरणीय क्षति हुई है ।भारतीय दर्शन ,भारतीय ज्ञान,भारतीय इतिहास ,भारतीय अध्यात्म और प्राचीन सांस्कृतिक विरासत को सृजन,आलोचना एवं शोध में उपेक्षित एवं तिरस्कृत किया गया है।इस मानसिकता के चलते कभी तो साधारण रचना कर्म को अतिश्रेष्ठ बताकर स्थापित किया गया है तो कभी प्रतिभाशाली रचनाकारों यथा अज्ञेय, दिनकर,नरेंद्र कोहली,अमृता प्रीतम जैसे लेखकों को भी इसलिए हाशिये पर फेंक दिया गया क्योंकि वह इस विचारधारा के संकीर्ण 'स्पेस' में 'फिट'नहीं बैठते थे। यहां लेखक दिनकर के साथ खड़ा नज़र आता है:"किसी भी कृति को मार्क्सवादी सिद्धांतों की कसौटी पर कस कर उसे क्रांतिकारी अथवा श्रेष्ठ स्थापित करने की चेष्टा अन्यायपूर्ण है।" उसके अनुसार इस एकांगी प्रभाव के चलते सतही,पूर्वग्रहयुक्त, भोथरी आलोचना ने हिंदी साहित्य को आक्रांत किया है। बहुत लंबे समय से भारतीय साहित्य एवं विमर्श के परिदृश्य से जुड़े होने तथा स्वयं रचनाकारों के इस जगत का एक अभिन्न अंग होने के कारण लेखक ने इस दुनिया को अंदर-बाहर बखूबी जाना है ,नामचीन लेखकों की हकीकत उसे पता है, इस जगत के अंतर्विरोध, अंतर्द्वंद उसे भली प्रकार ज्ञात हैं।इस सबके भीतर चलती राजनीति का भी इस पुस्तक में विस्तृत चित्रण किया गया है -चाहे वह लेखक हो, प्रकाशक हो ,साहित्य अकादमी हो, पुरस्कार हों,जलेस-प्रलेस, पीईएन जैसे संस्थान हों अथवा 'जुटान'या 'कबीर'जैसे एनजीओ-अनंत विजय की दृष्टि से कुछ नहीं बचा और पाठक को इस जगत की भरपूर झलक मिली है।अरुंधति रॉय ,महाश्वेतादेवी ,नयनतारा सहगल ,कृष्णा सोबती, प्रोफेसर जीएन साईबाबा ,एम एफ हुसैन ,तस्लीमा नसरीन, मैत्रेयी पुष्पा ,नामवर सिंह,अशोक वाजपेई, राजेंद्र यादव ,श्रीलाल शुक्ल ,आशीष नंदी ,अमर्त्य सेन शरणकुमार लिंबाले, लक्ष्मण गायकवाड, कमल किशोर गोयनका, ,मंगलेश डबराल ,उदय प्रकाश ,प्रोफेसर मुरुगन,अरुण कमल, गोविंद मिश्र, लीलाधर जगूड़ी ,जगदीश्वर चतुर्वेदी, भीष्म साहनी, उषा किरण खान ,कर्मेन्दु शिशिर,कूमी कपूर, नरेंद्र कोहली ,अमीश त्रिपाठी ,अश्विन सांघी ,देवदत्त पटनायक के संदर्भ इस आख्यान का हिस्सा हैं तो तुलसीदास ,कबीर,हज़ारीप्रसाद द्विवेदी,रामचंद्र शुक्ल,पंत,निराला,एवं अज्ञेय की चर्चा भी। लेखक ने विश्व एवं भारत में मार्क्सवाद के निरन्तर क्षीण हो रहे राजनीतिक प्रभाव की भी कारणों समेत विस्तृत चर्चा की है। अनंत विजय को यह श्रेय अवश्य देना होगा कि ऐसे विचारोत्तेजक विषय पर लिखते हुए भी उनकी भाषा -शैली संतुलित एवं संयमित ही रही है ।यद्यपि कुछ स्थानों पर तल्खी आ सकती थी यथा हावर्ड फास्ट का यहां सम्मिलित किया गया उद्धरण-"कम्युनिस्ट पार्टी एक ऐसी मशीन है जिसमें अच्छे लोग प्रवेश करते हैं और अंततः बुरे लोगों में परिवर्तित हो जाते हैं ।सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टियों में इस प्रक्रिया से बच पाना आमतौर पर जान देने की कीमत पर ही होता है" किंतु लेखक ने तेवर की आक्रामकता नहीं आने दी और विमर्श की शालीनता तथा सौम्यता को बनाये रखा है। उसकी निष्पक्षता एवं वस्तुनिष्ठता भी लगातार बनी रहती है जिसके रहते वह पाश्चात्य विदुषी वेंडी डोनिगर के 'कौशल 'एवं' ज्ञान' की मुक्तकंठ से प्रशंसा कर पाता है तथा ईमानदार स्वीकारोक्ति को अपने आख्यान का हिस्सा बनाता है:"यह सच है कि बौद्धिक जगत में वामपंथी विचारधारा की तुलना में दक्षिण पंथी विचारधारा के विद्वानों की संख्या कम है।"उसके अनुसार"मार्क्सवाद पर सवाल खड़े किए जा सकते हैं लेकिन उसको एकदम से खारिज नही किया जा सकता।" पढते हुए कहीं-कहीं पुनरावृत्यात्मकता का आभास ,विस्तार का आधिक्य एवं कथन-शैथिल्य पुस्तक के कथ्यप्रवाह को कभी-कभार अवरुद्ध करते प्रतीत होते हैं किंतु तर्कपूर्ण प्रस्तुति एवं रोचक प्रसंग उसे पुनर्जीवित कर देते हैं।भाषा की सरलता एवं सम्प्रेषणीयता कृति की ग्राह्यता एवं पठनीयता को व्यापक बनाती है। संक्षेप में कहें तो "सच को सच कहना ही होगा "का हठ करती यह पुस्तक साहित्य, विमर्श ,आलोचना, इतिहास ,दर्शन सबको विचारधारा के बंधन से मुक्त कर उन्हें वस्तुनिष्ठ और निष्पक्ष बनाने का सशक्त आग्रह है । यह ऐसे सृजनजगत की परिकल्पना है जहां साहित्यकार दलगत राजनीति से ऊपर है ,बौद्धिक आतंक से मुक्त हैं और साहित्य है वह शुभ सत्य जो व्यक्ति के जीवन एवं समाज को आंतरिक एवं बाह्य रूप से सुंदर,समृद्ध बनाता है । अपने इस उदात्त उद्देश्य के चलते यह पुस्तक मार्क्सवाद /मार्क्सवादियों की आलोचना के परे चली जाती है और एक नए विमर्श की यात्रा का प्रस्थान बिंदु बनती प्रतीत होती है। "मार्क्सवाद का अर्धसत्य" हिंदी के समकालीन वैचारिक परिदृश्य की एक महत्वपूर्ण कृति यूं भी है कि यह आज की उस युगचेतना का प्रतिनिधित्व करती है जो सिर्फ मनु पर ही प्रश्न नहीं उठा रही अपितु मार्क्स पर भी प्रश्न उठा रही है । हिंदी की बौद्धिक चेतना - यात्रा में यह कृति अगले पड़ाव के निकटागमन की घोषणा करती है तथा आश्वस्त करती है कि हिंदी की बौद्धिक चेतना जीवित है, जीवंत है और ‘पूर्ण’ सत्य की खोज में अग्रसर है ।पुस्तक कई आवश्यक,प्रासंगिक प्रश्न उठाती है जिन पर बौद्धिक जगत में विस्तार से चर्चा एवं विमर्श होना ही चाहिए। इस अवश्यपठनीय,विचारोत्तेजक कृति के लेखक अनंत विजय एवं सुरुचिपूर्ण पुस्तक-प्रोडक्शन हेतु वाणी प्रकाशन दोनों बधाई के पात्र हैं।मूल्य अधिक होने से यह पुस्तक अधिकतर पुस्तकालय-पुस्तक ही रहेगी,हिंदी के साधारण पाठक की पुस्तक नहीं बन पाएगी !पेपरबैक में इसकी उपलब्धता निस्सन्देह एक बहुमूल्य योगदान होगा। -डॉ रश्मि बजाज, कवि,समालोचक हरियाणा

Sunday, 5 June 2022

आतंकवाद पर कविता --- 'धीरे-धीरे निगल जाते हैं मरुस्थल मरुद्यानों को भी' --रश्मि बजाज


*धीरे-धीरे निगल जाते हैं मरुस्थल मरुद्यानों को भी...*

कई महाद्वीपों ,कई देशों 
कई प्रदेशों में
आते रहे वो 
और मैं 
चुप रहा 
या बोला
तो फिर 
और मुद्दों पर

मुतमइन था
कि चुप रहा 
या बोला हूं
तो और 
मुद्दों पर ही

पर वो
आ गए
मेरे लिए भी...

और फिर 
कुछ भी
कहने ,कहाने
सुनने, सुनाने को
नहीं बचा
कोई कहीं

धीरे-धीरे
निगल जाते हैं
मरुस्थल
मरुद्यानों को भी...     

                             ~रश्मि बजाज

  
                                                    

Saturday, 4 June 2022

HINDI CINEMA,HINDI POETRY AND THE JOURNEY OF CYCLE-FROM ROMANCE TO PHILOSOPHY


*साइकिल,हिंदी सिनेमा और कविता *

जनवाहन 'साइकिल ' मात्र एक वाहन न होकर  साहित्य और सिनेमा में एक प्रतीक और विमर्श बन गया है। हिंदी सिनेमा एवं हिंदी कवियों को इस द्विचक्रिका ने अच्छा- खासा आकर्षित किया है। हीरो -हीरोइन के रोमांस, हीरो की मस्ती, हीरोइन और उसकी सखियों द्वारा एक खास प्रकार की 'स्वतंत्रता'की अनुभूति से लेकर जीवन - दर्शन  का प्रस्तुतिकरण - बॉलीवुड में 'साइकिल और हम साथ साथ हैं'।' कभी सायरा बानो साइकिल पर झूमती हुई ऐलान करती हैं_" मैं चली मैं चली देखो प्यार की गली", कभी नरगिस प्यार के पंख लगा पंछी बन साइकिल को साथ लेकर सड़क को ही मुक्ताकाश बना लेती हैं " बन के पंछी गाएं तराना प्यार का", अनिल धवन चाहत लिए घूमते हैं "गुज़र जाएं दिन-३ ,हर पल गिन-३, किसी की हाय यादों में ,किसी की हाय बातों में "...गोविंदा जूही चावला को जबर्दस्त ऑफर देते हैं  "चांदी की साइकिल , सोने की सीट/आओ चले डार्लिंग चलें डबल सीट", भंवरे ने खिलाया फूल, फूल को ले गया राजकुंवर" की पीड़ा दिल में लिए  ऋषि कपूर  पद्मिनी कोल्हापुरे को साइकिल के डंडे पर बिठा-घुमा प्रतीकों में अपनी प्रेम- कथा सुनाते हैं तो "हे मैंने कसम ली , हे तूने कसम ली" में साइकिल देवानंद - मुमताज के प्रेम की साक्षी भी बनती है। अलग अंदाज़ वाले किशोर कुमार का  दावा है:"माइकल है तो साइकिल है माइकल नहीं तो साइकिल भी नहीं", आमिर खान और स्टूडेंट गैंग साइकिल की गद्दी को 'राजगद्दी 'बना हुंकार भरते हैं: " यहां के हम सिकंदर"। सिने- जगत की साइकिल के साथ जुड़ी जीवन-संघर्ष की एक 'विजुअल इमेज' जो भारतीय-मानस में हमेशा के लिए एक सजीव दृश्य एवं प्रेरणा बन कर 'फिक्स' हो गई  है :"जीवन चलने का नाम चलते रहो सुबहो- शाम /रास्ता कट जाएगा मितरा/ बादल छट जाएगा मित्रा "-की पृष्ठभूमि में जीने की जद्दोजहद करते मनोज कुमार---साइकिल अनेकानेक रूपों में बॉलीवुड-प्रेरित एवं केंद्रित आम भारतीय की प्रिय संगिनी है।

हिंदी कविता में साइकिल एक गंभीर विषय है। वीरेंद्र डंगवाल की  साइकिल- विषयक कविता की पंक्तियां हैं :

"अक्‍सर गंभीर लोग
साइकिल का हैंंडल थाम
लम्‍बे विचार-विमर्श करते थे"

और हमारे कवियों ने भी साइकिल पर संजीदा कविताएं लिखी हैं।  केदारनाथ सिंह के महत्वपूर्ण  काव्यसंग्रह के शीर्षक में साइकिल सम्मिलित है- " टॉलस्टॉय एवं साइकल"।वीरेंद्र डंगवाल एवं कृष्ण कल्पित की  विस्तृतफलक वाली सुंदर कविताओं में स्मृतियां, चाहतें, कवि‌ का जीवन -दर्शन , सामाजिक-सांस्कृतिक- साहित्यिक संदर्भ गुम्फित हैं।

वीरेंद्र डंगवाल के यहां  साइकिल है  -'मज़बूर किंतु 
स्वाभिमानी आदमी की सवारी ', पोस्टमैन उस पर बैठ कर आएगा मुस्कुराता', और 'अखबार वाला अपनी सनातन जल्दबाजी' में या 'शहर के सीमांत से आने वाला ड्राइवर' या फिर' दिहाड़ी मज़दूर'।वीरेंद्र डंगवाल के कविता- संसार में साइकिल को सार्थक करते हैं- जिजीविषा एवं जीवटयुक्त कर्मयोगी-

"एक आस को
 जिलाए रखने को 
भटकते भटकते बेदम हुए जाते वे हठीले भाईबंध 
जिन्हें थक कर बैठ जाना मंजूर नहीं"

 'रेख्ते के बीज एवं अन्य कविताएं', 'हिंदनामा'  जैसी ख्यात कृतियों के रचयिता कवि  कृष्ण कल्पित  Kalbe Kabir  के यहां

 "एक साइकिल की कहानी 

अंततः एक मनुष्य की कहानी है!"

 निर्जीव होते हुए भी साइकिल सजीव मनुष्य से कहीं अधिक ज़िंदा है-

"यह मनुष्य से भी अधिक मानवीय है 

चलती हुई कोई उम्मीद 

ठहरी हुई एक संभावना 

उड़ती हुई पतंग की अँगुलियों की ठुमक 

और पाँवों में चपलता का अलिखित आख्यान 

इसे इसकी छाया से भी पहचाना जा सकता है "

साइकिल का विशिष्टता एवं सार्थकता यह है ‌कि यह  आमजन का वाहन है देवगण अथवा गणमान्य का नहीं :

"मूषक पर गणेश 

बैल पर शिवजी 

सिंह पर दुर्गा 

मयूर पर कार्तिक 

हाथी पर इंद्र 

हंस पर सरस्वती 

उल्लू पर लक्ष्मी 

भैंसे पर यमराज 

बी. एम. डब्ल्यू पर महाजन 

विमान पर राष्ट्राध्यक्ष 

गधे पर मुल्ला नसररुद्दीन 

रेलगाड़ी पर भीड़ 

लेकिन साइकिल पर हर बार कोई मनुष्य 

कोई हारा-थका मज़दूर 

स्कूल जाता बच्चा 

या फिर पटना की सड़कों पर 

जनकवि लालधुआँ की पत्नी 

कैरियर पर सिलाई मशीन बाँधे हुए 

साइकिल अकेली सवारी है दुनिया में 

जो किसी देवता की नहीं है "

कवि के लिए यह मनुष्य की आदि -मित्र है जो साथ है कवियों और सिनेमाकारों के:

 "मनुष्य और मशीन की यह सबसे प्राचीन 

दोस्ती है जिसे कविता में लिखा पंजाबी कवि 

अमरजीत चंदन ने और सिनेमा में दिखाया 

वित्तोरियो दे सिका ने ‘बाइसिकल थीफ़’ में "

सर्वहारा- सवारी साइकिल जुड़ी है मनुष्यता से - समाज के आखरी पायदान पर खड़े आखरी व्यक्ति से -

"ग़रीबी, यातना और अपमान की जिन 

अँधेरी और तंग गलियों में 

मनुष्यता रहती है 

वहाँ तक सिर्फ़ साइकिल जा सकती है "

हमारे मनहूस दौर में दैनिक जीवन का हिस्सा बनती हिंसा   के  प्रभाव से  साइकिल और साइकिल वाले भी  कहां बच पाते हैं - टिफिन कैरियर में रोटी की जगह बम परोसती हमारी सभ्यता और संस्कृति का भविष्य कहीं खलाओ में खो गया ही मालूम होता है।

"घटना-स्थल पर पाई गई सिर्फ़ इस बात से 

हम इस निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सकते कि 

साइकिल का इस्तेमाल मनुष्यता के विरोध में 

किया गया जब लाशें उठा ली गई थीं 

और बारूद का धुआँ छट गया था तब 

साइकिल के दो चमकते हुए चक्के सड़क के 

बीचोबीच पड़े हुए थे घंटी बहुत दूर 

जा गिरी थी और वह टिफ़िन कैरियर जिसमें 

रोटी की जगह बम रखा हुआ था कहीं 

ख़लाओं में खो गया था। "

साइकिल, मनुष्यता और मानवता कृष्ण कल्पित के  संसार में समानार्थक हैं।ना साइकिल का कोई 'शोक गीत 'हो सकता है ना मनुष्यता और मानवता का!

जहां बॉलीवुड के लिए साइकिल कुछ अपवाद छोड़कर अधिकतर एक रोमांस और मस्ती से जुड़ा उपकरण है, वहीं  कवितालोक में  इसका  प्रतीकात्मक एवं विमर्शात्मक महत्व हो जाता है विशेष कर ‌तब जब यह वीरेंद्र डंगवाल और कृष्ण कल्पित सरीखे समर्थ ‌कवियों के विचार एवं भावजगत का वाहन बन जाए!

तो दोस्तो, विश्व साइकिल दिवस मुबारक!

आइए ,गतिमान रहें , कर्मठ रहें, मनुष्यता से मानवता की यात्रा शुभ हो... 💐

Monday, 6 September 2021

TO MY DEAR AFGHANI SISTERS-WITH LOVE-POEM BY RASHMI BAJAJ.


My dear Afghani sisters !
Today 
I don't have for you
Any assurances
Any tender poems.

Your momentous helplessness
Your phenomenal suffering
Have dwarfed
All words of
World -encyclopaedias and dictionaries.

Ours are the fateful times
When all conventional
Myths, narratives ,idioms
Dreams, Aspirations
Stand crushed and shattered
No more can I acquiese:
 “pen is mightier
 than the sword.”

Your own
Family men
Your brothers, husbands, sons
Have deserted ,dumped you
And fled...

World Superpowers ,Peace -agencies 
Media-commandos , intellectual -warriors 
All scared,all stiffled
Stand mere mute spectators

THIS IS THE WAR
YOU have to wage
My dear sisters
For your own sake
And for your daughters,
And in a war
Not tears of misery
But blood of braves
Writes
The final victory and history...


                                   Rashmi Bajaj 





Sunday, 31 May 2020

रश्मि बजाज की 'ढूंढ रही हूँ...'एवं अन्य कविताएं(पुरवाई)


रश्मि बजाज की तीन कविताएँ

 
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1- ढूँढ़ रही हूँ …
ढूँढ़ रही हूँ
मैं
वह प्यार
रश्मि-रथ पर
हो सवार
आ उतरता है जो
भोरीली स्वप्निल
पलकों पर
मुस्काता है
चन्द्रोन्मेषित
कुमुदिनी
के नयनों में
चमकता है
जुगनू के
जगमग पंखों पे
बरसता है
सावन की
रिमझिम फुहार में
कूकता है
बंसत के
पुलकित पिक-गान में
गूँजता है
ब्रह्ममुहूर्तीय प्रार्थनाओं
के सूर में
धड़कता है
जनमानस के
उर में
और लिये
आंचल में
जिसको
चलती है
मदमस्त बयार
ढूंढ़ रही हूँ मैं
वह प्यार –
नहीं जिसकी
भाषा
परिभाषा
कोई सीमा
कुछ आकार
जो है
शुभ्र प्रकाशपुंज
और बनता
अनुभूति
उस क्षण
हो जाती है जब
लुप्त देह
व बनते हम
आकाशगंगा के
दिव्य कुसुम… 
2- चलोगे मेरे साथ तुम ?
अनजाना है पथ
हुआ करे
नहीं चलना मुझे
मूँदे आँखें
घिसे-पिटे
उस रस्ते पर
नहीं जहाँ कोई
मील-पत्थर!
मेरी मंज़िल
है अज्ञात
मेरा चलन
है भटकन
पाँव के छाले
धूप की जलन
बढ़ते कदम –
बादलों के पार
क्षितिज के पार
तारों के पार…
चलोगे मेरे साथ तुम ?
कौन जाने
ढूंढ लायें हम –
नयी भागीरथी
नयी गंगोत्री
नये द्वीप
नये तारक
नया मनु ?
3 – कौन जाने?
श्वेत या श्याम
देखने वाली
यह वर्णान्ध जगती
नहीं सराहेगी
तुम्हारे
इन्द्रधनुषीय स्वप्न
किन्तु तुम
मत घबरा
नाकिंचित भी!
हर सुन्दर वास्तविकता
करती है
यहां प्रतीक्षा
एक सुनहरे स्वप्न की
कौन जाने
वो तुम्हारा ही
स्वप्न हो
जिसकी प्रतीक्षा में
सदियों से है
यह सृष्टि…

Tuesday, 26 May 2020

रश्मि बजाज की सुप्रसिद्ध स्त्रीवादी कविता:'मृत्योर्मा जीवनं गमय'(1998)








मृत्योर्मा जीवनं गमय
नारीवाद
नहीं बपौती –
गाँव अथवा महानगर की
निम्नवर्ग या उच्चवर्ग की
अंग्रेज़ी या हिन्दीभाषी की
राजनेता या बुद्धिजीवी की

क्रन्दन है यह
अस्तित्व की उस पीड़ा का
जो आँकड़ों में ढल तो जाती है
पर चैन नहीं पाती!

त्रासदी है यह
गर्भ में सिमटी पड़ी
मेरी उस बेटी की
जो भ्रूणहत्या के भय से
पनप नहीं पाती!

ज्वाला है यह
धधक रही अनगिनत चिताओं की
जो सदियों से आज तलक
बुझ नहीं पाती!

चाह है यह
अनन्त के सौन्दर्य
व विराट के साहचर्य की
जो आदिसृष्टि से
मुझे सताती

स्वप्न है यह
अर्धनारीश्वर की सार्थकता का
जो बहुत चाहकर भी
नहीं होने पाता
वास्तविकता

‘‘औरत’’ , ‘‘वूमैन’’ , ‘‘स्त्री’’
शब्द हो कोई
क्या फर्क पड़ता है?
हर देश, काल, भाषा में
रक्ताश्रुसिक्त मेरी कथा है

मेरा नारीवाद
राम की मर्यादा
लक्ष्मण की रेखा
भीम की गदा
व कृष्ण-प्रदत्त चीर
से कहीं अधिक चाहता है

दुस्साहस है यह
एक नन्ही बदली का
नहीं पर्याप्त जिसे
मात्र कोना
और जो चाहे
विस्तृत नभ होना
यात्रा है यह
सांझी पीड़ा व सांझी नियति की
जिसका मार्ग हो कर गुजरता है –
कतिहार से कायरो
भागीरथी से मिसीसिपी

सैफो से तसलीमा नसरीन
जानाबाई से अमृता प्रीतम
लक्ष्मीबाई से भंवरी बाई
सब के सब हैं
मेरे सहयात्री
असतो मा सद् गमय
तमसो मा ज्योतिर्गमय
मृत्योर्मा जीवनं गमय

जानती हो
सूर्या, सावित्री, घोषा, विश्वावरा
कैसे गया
तुम्हें व तुम्हारी जाति को
छला ?
उदात्त चिन्तन के प्रमाणस्वरूप
वेदों में जब सम्मिलित की जा रही थीं
तुम्हारी विरचित ऋचाएँ
तब भी गूँज रह थीं सर्वदिक्
‘‘पुत्रं देहि’’ की प्रार्थनाएँ!

कालान्तर में मुझ पर क्या क्या न गुजरा
राणा का विषप्याला मैंने पिया
खाक छानी जंगलों की
हो हब्बा व लल्ला आरिफा
सिल्विया प्लाथ, मारीना स्वेतायेवा, सारा शगुफ्ता बन
करनी पड़ी है मुझे
कई बार आत्महत्या
शंकराचार्य ने
वेदपाठमात्र का हक छीना
बचती फिरती हूँ फतवों से
मैं बन तसलीमा
मेरा फतवा लेकिन है
वह फरमाने-खुदा
खुदा था जो
आदम की उस पसली पर
जिससे मेरे अल्लाह ने मुझे रचा

मैं हूँ शाश्वत बेघर
नहीं कोई मेरा घर –
रामप्रसाद
पंचवटी
अशोकवाटिका
वाल्मीकिकुटीर
धरती का बोझ
धरती की गोद

नहीं कोई मेरा अपना
अर्जुन को छीन
पाँच पतियों में
बाँटने वाली कुन्ती
जुए में
दाँव पर लगा डालने वाले पति
प्रतिज्ञाबद्ध क्लीव भीष्मपितामह
अथवा
महाप्रस्थान वेला में
मेरे देहत्याग को
न्यायसंगत ठहराते धर्मराज

मेरी वर्णमाला
है एकाक्षरा
जो ‘‘प’’ से प्रारम्भ हो
‘‘प’’ पर ही समाप्त हो जाती –
पिता, पुत्र व पति

बीन भी हूँ मैं तुम्हारी
रागिनी भी
और मेरे गीत संगीत में
है मात्र एक स्वर ही
तुम बस तुम

मेरा गणित है
शून्य का गणित
शून्य-जिसके बिना असंभव हैं
तुम्हारे समस्त समीकरण
किन्तु स्वयं शून्य
मात्र शून्य

बलराम ने हल की नोक से
बार-बार दबा
कर डाला है मुझे
पूर्णरूपेण बौना
कभी शबरी
कभी अंरुधती
कभी श्रुतावती बनी
सदियों से मैं आई हूँ
बेर पकाती और खिलाती
व बना डाला है तुमने
रसोईघर को ही मेरा शवगृह
तुम्हारा अक्षयपात्र
रीत जाता है
मेरे भोजन से पहले

तुम्हारा बादल नहीं बरसता मेरे आंगन
तुम्हारा सूरज नहीं चमकता मेरे सहन
तुम्हारा बसंत नहीं उतरता मेरे उपवन
और मैं खड़ी हूँ आज तक –
प्यासी, अंधी व ठूंठ ।

मेरा इतिहास सदा
औरों ने लिखा है
व मेरा जीवन सदा
औरों ने जिया है

सदियों से चल रहे इस नाटक में
न सूत्र है मेरा, न सूत्रधार
न भाव-भंगिमाएँ, न मुद्राएँ
यहाँ तक कि
दर्शक भी नहीं हैं मेरे

आज
तुम्हारा साथ देने के लिए
अपनी आँखों पर बांधी पट्टी
मैंने हटा दी है
व सब कुछ स्पष्ट दीख रहा है –
तुम्हारा मृगमारीचिकी
मायामृगी मोहपाश
जंगलकानून नियन्त्रित
तुम्हारा नन्दनवन
जो वास्तव में है क्रन्दनवन
कैद हैं जहाँ
मेरे कामधेनु व कामवृक्ष

इस बार
मैं
राह में
स्वर्णफल व स्वर्णमृग के छलावे में
न्हीं आऊँगी
नित्यप्रति देती रही हूँ अग्निपरीक्षा
जलती रही हूँ रोम-रोम
व बन गई हूँ
राख की मात्र एक ढ़ेरी
भीतरी की सुलगती चिंगारी ने
किन्तु मेरा साथ दिया है
और मैंने
राख से
स्वयं पुनर्जन्म लेने का
क्कनूसी धर्म सीख लिया है

स्व-मन्थन कर आज मैंने
प लिया है अपना
अमृत कलश
व निरर्थक हैं अब कर डाले –
तुम्हारी चिताओं की अग्नि
तुम्हारे विष के प्याले
न मां छिन्दन्ति शस्त्राणि
न मां दहति पावक:
काल की यज्ञवेदी पर बैठ
करती निर्भय वेदमन्त्रोच्चारण
साहस की अंजुलि में
भर जागृति का जल
ले संकल्प की हवि
डाल रहीं हूँ मैं आहुति
व कर रही हूँ आह्वान आज
एक नये युग का –
कन्यां देहि!
कन्यां देहि!!
कन्यां देहि!